6 साल की उम्र में किया विस्फोट और 18 साल की उम्र में देश के लिए शहीद हो गए ये क्रांतिकारी

बहुत सालो तक अंग्रेज़ो की गुलामी करने के बाद हमारा देश 15 अगस्त 1947 को आज़ाद हो गया. हर साल उसी आज़ादी को मानाने के लिए और अपने स्वतंत्र सैलानियों को याद करने के लिए यह दिन हर साल मनाया जाता है. जब भी स्वतन्त्रता दिवस के दिन कोई भी स्वतंत्रा सैलानियों को याद करता है तो उसमे 3,4 नाम जैसे की महात्मा गाँधी, लाला लाजपत राइ, सुभाष चंद्र बोस जरूर आते है.

पर भारत को स्वतंत्र दिलाने के पीछे छन लोगो का नहीं बल्कि हज़ारो लोगो का हाथ था. उनसे से एक थे खुदी राम बोस. खुदीराम बोस देश की आजादी के लिए 18 साल की उम्र में हे देश के लिए फांसी के फंदे पर झूल गए. इतनी कम उम्र में देश के लिए बलिदान दे देना कोई आसान काम नहीं है.

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बोस की बलिदान की कहानी उनकी मातृभूमि बंगाल में तो लोकप्रिय लोककथा है, लेकिन उनकी कहानी राज्य के बाहर अज्ञात है. बोस जैसे कई अन्य स्वतंत्रता सैनानी भी है जिन्होंने भारत की स्वतंत्रता के लिए अपनी ज़िंदगी का बलिदान किया लेकिन उनकी स्वतंत्रता की बड़ी कहानी में किसी का ध्यान नहीं दिया गया.

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आइये बतातें है हम उनके बारे में पूरे विस्तार से

खुदी राम सिर्फ नौवीं कक्षा में थे जब उन्होंने देश के लिए लड़ाई लड़ने के लिए स्कूल छोड़ दिया था.स्कूल छोड़ कर वो स्वदेसी आंदोलन में भाग लेने निकल पड़े। इसके बाद बोस रिवोल्यूशनरी पार्टी का हिस्सा बन गए.

एक छात्र के रूप में, बोस मिदनापुर क्षेत्र में गुप्त क्रांतिकारी समूहों के लिए एक दूत के रूप में कार्य करने के लिए जाने जाते थे.

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30 अप्रैल 1908 को, खुदीराम ने यूरोपीय क्लब के बाहर किंग्सफोर्ड को ले जाने वाले कैरिज पर एक बम फेंक दिया। किंग्सफोर्ड की बग्गी देखकर उस पर भी हमला किया. मगर उस बग्गी में किसी और ब्रिटिश अफसर की पत्नी और बच्ची थे.

इस हादसे के बाद अंग्रेज़ो ने उन्हें पकड़ कर जेल में डाल दिया. इसके बाद उन्हें फांसी की सजा सुनाई दी. खुदीराम बहुत निडर थे. वह बिना डरे खुद हे फांसी के फंदे में जाकर झूल गए. उनको श्रन्धांजलि देने के लिए स्कूल और कॉलेज काफी दिनों तक बंद रहे.

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